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गांधी जयंती: उनमें भी वो सब खामियां थीं, जो हममें हैं

Desk

महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर चलने का सोचें तो रूह कांप जाती है। वे महामानव और हम बहुत बौने नज़र आते हैं, लेकिन ‘सत्य के प्रयोग’ में उन्होंने बताया है कि साधारण से असाधारण की यात्रा उन्होंने कैसे की। आज उनकी 146वीं जयंती पर प्रसिद्ध गांधीवादी व गुजरात विद्यापीठ के पूर्व वाइस चांसलर सुदर्शन आयंगर और महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अनिल राय बता रहे हैं कैसे खामियों को मात देकर महान बने गांधी.. हम सब जैसे मोहनदास... मन पर रहता है डर का साया बचपन से ही डर हम पर सवार हो जाता है। हम अंधेरे में जाने से डरते हैं। चोर, सांप, कल्पना के भूत हमें डराते हैं। इंग्लैंड पढ़ने जाने के पहले राजकोट हाईस्कूल में विदाई समारोह में लिखा हुआ भाषण पढ़ने में गाधीजी का शरीर कांपने लगा। खुद में साहस की कमी थी। लोगों से मिलने से कतराते। नई सोच स्वभाव में नहीं हम सब परम्परा में बंधकर चलने में ही बेहतर महसूस करते हैं। कितने लोग समाज से हटकर अलग कर पाते हैं। इसे ही आज की भाषा में इनोवेशन कहते हैं। शुरू में नई सोच गांधीजी के स्वभाव में नहीं थी। पर्सनैलिटी से जुड़ी कईं परेशानियां थीं। डर, पत्नी से रिश्तों में दिक्कतें, लेकिन इन्हें लेकर वे कोई नई सोच नहीं अपना पाए। भाषण देने से दिल घबराए स्टेज फीयर किसे नहीं होता। हम सब मंच पर जाने से किसी न किसी उम्र में घबराते रहे हैं। कई बार तो यह डर उम्रभर बना रहता है। गांधीजी भी सार्वजनिक रूप से बोलने में घबराहट महसूस करते थे। इंग्लैंड में वे एक वेजीटेरियन कमिटी के मेंबर तो बन गए पर मीटिंग में कुछ न बोलते। उनके साथी डॉ. ओल्डफील्ड ने कहा भी, “मेरे साथ तो तुम खूब बोलते हो पर वहां तुम्हारी जबान ही नहीं खुलती। तुम्हें नर मधुमक्खी कहना होगा।” हल खोजने का हुनर गायब आज जिसे रिसोर्सफुलनेस कहा जाता है, वह हममें अनुभव के साथ विकसित होती है। इंग्लैंड में जब वे ब्रिटिश परिवार में रहते थे तो रोजमर्रा की बातें न सुलझाने के कारण उनका काफी पैसा खर्च हो जाता। पर वे इन समस्याओं का कोई अनोखा हल नहीं खोज पाए। उपाय कुशलता का अभाव था। बात समझाने में नाकामी हम सबको अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में परेशानी आती है। ‘कोई मुझे समझता ही नहीं’ यह आम जुमला होता है। यही दिक्कत इंग्लैंड में गांधीजी को भी पेश आती। वे अकसर चिट्ठियों का सहारा लेते। जब नाच-गाना सीखना छोड़ा तो उन्होंने टीचर्स को एक खत लिखकर इसकी जानकारी दी। यह खत लिखे हुए भाषण की तरह था। वक्त की धार में बहना हम सब अपने वक्त के गुलाम होते हैं। वो अनोखे लोग ही होते हैं, जो वक्त से आगे की सोच पाते हैं और उसके हिसाब से कदम उठाते हैं। गांधीजी भी अपने समाज, अपने धर्म और सामाजिक परंपराओं से बंधे थे और काफी वक्त तक वे इसके कारण आने वाली बाधाओं से जूझते रहे। हालांकि, कई बार परंपरागत मूल्यों ने ही उन्हें काफी हद तक भटकने से बचाया भी। शुरुआत में साधारण पर्सनैलिटी थी गांधीजी की आमतौर पर हम में से बहुत कम लोग होंगे, जो जीवन की शुरुआत में ही करिश्माई व्यक्तित्व के धनी होंगे। गांधीजी की पर्सनैलटी भी शुरुआत में बहुत ही साधारण थी। इसी कारण वे देश में वकालत शुरू नहीं कर पाए और नई शुरुआत करने के लिए इरादे से दक्षिण अफ्रीका गए। वहां नई चुनौतियों से उनकी पर्सनैलिटी को धार मिलने लगी, लेकिन वह बाद की बात है। यह समस्या लंबे समय तक बनी रही। बेहद जिद्‌दी स्वभाव हम सब चाहते हैं कि जो हम करते हैं, वहीं दूसरे भी करें। गांधीजी का भी यही रवैया था। अपना तपस्वी जैसा व्यवहार वह अपने साथियों पर भी पर लादना चाहते थे। इससे पत्नी व बेटों के साथ रिश्तों में बहुत मुश्किलें आईं। अपनी सादगी और साफ-सफाई को लेकर कस्तूरबा से उनका विवाद अधिकतर लोग जानते हैं। किंतु वे बन सके महात्मा, क्योंकि... डर का नाम नहीं उस दौर में कौन सोच सकता था कि बेहद ताकतवर ब्रिटिश एम्पायर से केवल अहिंसा के बूते टकराया जा सकता है। उन्होंने व्यक्तिगत निडरता का उदाहरण देकर लोगों में ब्रिटिश शासन से टकराने का साहस भर दिया। सच्चाई पर डटे रहने से उनका डर दूर हुआ। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को यदि उनका कोई सबसे बड़ा योगदान है, तो वह है निडरता का संचार यानी लोगों में डर की भावना खत्म कर देना। नई सोच और नए उपाय गांधीजी ने आंदोलनों में जो इनोवेशन दिखाया वह चमत्कृत कर देता है। उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटेन भारत के साथ आर्थिक व्यापार पर बहुत निर्भर है। उन्होंने लोगों को अपना कपड़ा तैयार करने के लिए प्रेरित किया। सोशल सेक्टर में भी छुआछूत, महिला शिक्षा, स्वच्छता और बुराइयों के खिलाफ आंदोलन शुरू किए। वे एक साथ कई चीजों के बारे में सोच सकते थे। महान लेखक और वक्ता भाषण देने के नाम से हाईस्कूल के विदाई समारोह में मंच से कूदकर भागने वाले गांधीजी बाद में महान वक्ता साबित हुए। उनके भाषण से प्रेरित पूरा देश स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा। लेखन में उनके सादगी ने कमाल कर दिया। वे सीधे शब्दों में बात कहते, जो लोगों के दिल को छू लेती। नए उपाय खोजने में महारत गांधीजी इतने रिसोर्सफुल, उपाय खोजने में इतने काबिल थे कि उन्होंने चरखे को स्वतंत्रता आंदोलन का जरिया बना दिया। खादी को सेल्फ डिपेंडेंस का प्रतीक बनाया। स्वतंत्रता आंदोलन के हर मोड़ पर वे नया विचार लेकर आए। विदेशी बहिष्कार, असहयोग, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे इसके उदाहरण हैं। लोगों से बातचीत की काबिलियत शुरुआत में जहां उन्हें अपनी बात लोगों तकत पहुंचाने में दिक्कत आती थी, वहीं बाद में उन्होंने खुद को महान शिक्षक में तब्दील कर लिया। आज यह सोचकर हैरत होती है कि उस समय के अनपढ़ आम लोगों तक कैसे उन्होंने अपने विचार पहुंचाए और लोगों को उन पर चलने के लिए प्रेरित भी किया। पांच साल देश को गहराई से जानकर उन्होंने यह काबिलियत पैदा की। अपने समय से आगे गांधीजी की सोच अपने समय से बहुत आगे थी। यही वजह है कि अमेरिका के मार्टिंन लूथर किंग जैसे समाज सुधारक और दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को उनके विचार और अहिंसा का तरीका बेहद पसंद आए। इन्हें अपनाकर वे कामयाब भी हुए। इतना ही नहीं नई सदी में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा भी उनके विचारों से प्रेरित हुए। करिश्माई व्यक्तित्व सच्चे सिद्धांत किस तरह से साधारण व्यक्तित्व को करिश्माई व्यक्तित्व में बदल देती है, गांधीजी उसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। सत्य, अहिंसा, सादगी जैसे गुणों के प्रति अटल विश्वास ने उनके व्यक्तित्व में वह जादू पैदा किया, जिसने अल्बर्ट आइंस्टीन से लेकर आम लोगों तक सबको प्रभावित किया। मू्ल्यों पर अटूट विश्वास उनके व्यक्तिगत सिद्धांत ही राजनीति का आधार बने। वे राजनीति की चकाचौंध से प्रभावित नहीं हुए। स्वभाव से जिद्दी गांधीजी बाद में मूल्यों पर डटे रहने के लिए प्रसिद्ध हो गए। सही बात पर डटे रहने के कारण ही उन्होंने चौराचौरी कांड के बाद आंदोलन वापस ले लिया था। लालबहादुर शास्त्री, भूतपूर्व प्रधानमंत्री 111वीं जयंती चार काम जो उन्होंने गांधीवादी सिद्धांतों को मूर्त रूप देने के लिए किए महिलाओं की आत्मनिर्भरता ट्रांसपोर्टेशन में महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की शुरुआत शास्त्रीजी ने की। स्वतंत्रता के बाद वे उत्तर प्रदेश में गोविंद वल्लभ पंत के नेतृत्व वाली सरकार में ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर रहते उन्होंने यह फैसला लिया। अहिंसा का रास्ता उत्तर प्रदेश में पुलिस मंत्रालय के मुखिया रहते हुए भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी का इस्तेमाल शास्त्रीजी ने शुरू करवाया। इससे पहले तक विरोध प्रदर्शनों में पुलिस लाठी का उपयोग करती थी। भ्रष्टाचार विरोध, नैतिकता पर जोर केंद्रीय गृह मंत्री रहते हुए देश में पहली बार कमेटी ऑन प्रिवेंशन ऑफ करप्शन बनाने का फैसला लिया। 1956 में तमिलनाडु के अरियालूर में रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा दे दिया था। स्पष्ट लक्ष्य, सबकी समृद्धि शास्त्रीजी का स्पष्ट लक्ष्य था- सबकी समृद्धि। 1964 में प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले भाषण में उन्होंने यही कहा था- हमारा लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट है: सबकी समृद्धि। लोकतांत्रिक समाजवादी राष्ट्र का विकास करना।महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर चलने का सोचें तो रूह कांप जाती है। वे महामानव और हम बहुत बौने नज़र आते हैं, लेकिन ‘सत्य के प्रयोग’ में उन्होंने बताया है कि साधारण से असाधारण की यात्रा उन्होंने कैसे की। आज उनकी 146वीं जयंती पर प्रसिद्ध गांधीवादी व गुजरात विद्यापीठ के पूर्व वाइस चांसलर सुदर्शन आयंगर और महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अनिल राय बता रहे हैं कैसे खामियों को मात देकर महान बने गांधी.. हम सब जैसे मोहनदास... मन पर रहता है डर का साया बचपन से ही डर हम पर सवार हो जाता है। हम अंधेरे में जाने से डरते हैं। चोर, सांप, कल्पना के भूत हमें डराते हैं। इंग्लैंड पढ़ने जाने के पहले राजकोट हाईस्कूल में विदाई समारोह में लिखा हुआ भाषण पढ़ने में गाधीजी का शरीर कांपने लगा। खुद में साहस की कमी थी। लोगों से मिलने से कतराते। नई सोच स्वभाव में नहीं हम सब परम्परा में बंधकर चलने में ही बेहतर महसूस करते हैं। कितने लोग समाज से हटकर अलग कर पाते हैं। इसे ही आज की भाषा में इनोवेशन कहते हैं। शुरू में नई सोच गांधीजी के स्वभाव में नहीं थी। पर्सनैलिटी से जुड़ी कईं परेशानियां थीं। डर, पत्नी से रिश्तों में दिक्कतें, लेकिन इन्हें लेकर वे कोई नई सोच नहीं अपना पाए। भाषण देने से दिल घबराए स्टेज फीयर किसे नहीं होता। हम सब मंच पर जाने से किसी न किसी उम्र में घबराते रहे हैं। कई बार तो यह डर उम्रभर बना रहता है। गांधीजी भी सार्वजनिक रूप से बोलने में घबराहट महसूस करते थे। इंग्लैंड में वे एक वेजीटेरियन कमिटी के मेंबर तो बन गए पर मीटिंग में कुछ न बोलते। उनके साथी डॉ. ओल्डफील्ड ने कहा भी, “मेरे साथ तो तुम खूब बोलते हो पर वहां तुम्हारी जबान ही नहीं खुलती। तुम्हें नर मधुमक्खी कहना होगा।” हल खोजने का हुनर गायब आज जिसे रिसोर्सफुलनेस कहा जाता है, वह हममें अनुभव के साथ विकसित होती है। इंग्लैंड में जब वे ब्रिटिश परिवार में रहते थे तो रोजमर्रा की बातें न सुलझाने के कारण उनका काफी पैसा खर्च हो जाता। पर वे इन समस्याओं का कोई अनोखा हल नहीं खोज पाए। उपाय कुशलता का अभाव था। बात समझाने में नाकामी हम सबको अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में परेशानी आती है। ‘कोई मुझे समझता ही नहीं’ यह आम जुमला होता है। यही दिक्कत इंग्लैंड में गांधीजी को भी पेश आती। वे अकसर चिट्ठियों का सहारा लेते। जब नाच-गाना सीखना छोड़ा तो उन्होंने टीचर्स को एक खत लिखकर इसकी जानकारी दी। यह खत लिखे हुए भाषण की तरह था। वक्त की धार में बहना हम सब अपने वक्त के गुलाम होते हैं। वो अनोखे लोग ही होते हैं, जो वक्त से आगे की सोच पाते हैं और उसके हिसाब से कदम उठाते हैं। गांधीजी भी अपने समाज, अपने धर्म और सामाजिक परंपराओं से बंधे थे और काफी वक्त तक वे इसके कारण आने वाली बाधाओं से जूझते रहे। हालांकि, कई बार परंपरागत मूल्यों ने ही उन्हें काफी हद तक भटकने से बचाया भी। शुरुआत में साधारण पर्सनैलिटी थी गांधीजी की आमतौर पर हम में से बहुत कम लोग होंगे, जो जीवन की शुरुआत में ही करिश्माई व्यक्तित्व के धनी होंगे। गांधीजी की पर्सनैलटी भी शुरुआत में बहुत ही साधारण थी। इसी कारण वे देश में वकालत शुरू नहीं कर पाए और नई शुरुआत करने के लिए इरादे से दक्षिण अफ्रीका गए। वहां नई चुनौतियों से उनकी पर्सनैलिटी को धार मिलने लगी, लेकिन वह बाद की बात है। यह समस्या लंबे समय तक बनी रही। बेहद जिद्‌दी स्वभाव हम सब चाहते हैं कि जो हम करते हैं, वहीं दूसरे भी करें। गांधीजी का भी यही रवैया था। अपना तपस्वी जैसा व्यवहार वह अपने साथियों पर भी पर लादना चाहते थे। इससे पत्नी व बेटों के साथ रिश्तों में बहुत मुश्किलें आईं। अपनी सादगी और साफ-सफाई को लेकर कस्तूरबा से उनका विवाद अधिकतर लोग जानते हैं। किंतु वे बन सके महात्मा, क्योंकि... डर का नाम नहीं उस दौर में कौन सोच सकता था कि बेहद ताकतवर ब्रिटिश एम्पायर से केवल अहिंसा के बूते टकराया जा सकता है। उन्होंने व्यक्तिगत निडरता का उदाहरण देकर लोगों में ब्रिटिश शासन से टकराने का साहस भर दिया। सच्चाई पर डटे रहने से उनका डर दूर हुआ। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को यदि उनका कोई सबसे बड़ा योगदान है, तो वह है निडरता का संचार यानी लोगों में डर की भावना खत्म कर देना। नई सोच और नए उपाय गांधीजी ने आंदोलनों में जो इनोवेशन दिखाया वह चमत्कृत कर देता है। उन्होंने भांप लिया था कि ब्रिटेन भारत के साथ आर्थिक व्यापार पर बहुत निर्भर है। उन्होंने लोगों को अपना कपड़ा तैयार करने के लिए प्रेरित किया। सोशल सेक्टर में भी छुआछूत, महिला शिक्षा, स्वच्छता और बुराइयों के खिलाफ आंदोलन शुरू किए। वे एक साथ कई चीजों के बारे में सोच सकते थे। महान लेखक और वक्ता भाषण देने के नाम से हाईस्कूल के विदाई समारोह में मंच से कूदकर भागने वाले गांधीजी बाद में महान वक्ता साबित हुए। उनके भाषण से प्रेरित पूरा देश स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़ा। लेखन में उनके सादगी ने कमाल कर दिया। वे सीधे शब्दों में बात कहते, जो लोगों के दिल को छू लेती। नए उपाय खोजने में महारत गांधीजी इतने रिसोर्सफुल, उपाय खोजने में इतने काबिल थे कि उन्होंने चरखे को स्वतंत्रता आंदोलन का जरिया बना दिया। खादी को सेल्फ डिपेंडेंस का प्रतीक बनाया। स्वतंत्रता आंदोलन के हर मोड़ पर वे नया विचार लेकर आए। विदेशी बहिष्कार, असहयोग, भारत छोड़ो आंदोलन जैसे इसके उदाहरण हैं। लोगों से बातचीत की काबिलियत शुरुआत में जहां उन्हें अपनी बात लोगों तकत पहुंचाने में दिक्कत आती थी, वहीं बाद में उन्होंने खुद को महान शिक्षक में तब्दील कर लिया। आज यह सोचकर हैरत होती है कि उस समय के अनपढ़ आम लोगों तक कैसे उन्होंने अपने विचार पहुंचाए और लोगों को उन पर चलने के लिए प्रेरित भी किया। पांच साल देश को गहराई से जानकर उन्होंने यह काबिलियत पैदा की। अपने समय से आगे गांधीजी की सोच अपने समय से बहुत आगे थी। यही वजह है कि अमेरिका के मार्टिंन लूथर किंग जैसे समाज सुधारक और दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को उनके विचार और अहिंसा का तरीका बेहद पसंद आए। इन्हें अपनाकर वे कामयाब भी हुए। इतना ही नहीं नई सदी में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा भी उनके विचारों से प्रेरित हुए। करिश्माई व्यक्तित्व सच्चे सिद्धांत किस तरह से साधारण व्यक्तित्व को करिश्माई व्यक्तित्व में बदल देती है, गांधीजी उसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। सत्य, अहिंसा, सादगी जैसे गुणों के प्रति अटल विश्वास ने उनके व्यक्तित्व में वह जादू पैदा किया, जिसने अल्बर्ट आइंस्टीन से लेकर आम लोगों तक सबको प्रभावित किया। मू्ल्यों पर अटूट विश्वास उनके व्यक्तिगत सिद्धांत ही राजनीति का आधार बने। वे राजनीति की चकाचौंध से प्रभावित नहीं हुए। स्वभाव से जिद्दी गांधीजी बाद में मूल्यों पर डटे रहने के लिए प्रसिद्ध हो गए। सही बात पर डटे रहने के कारण ही उन्होंने चौराचौरी कांड के बाद आंदोलन वापस ले लिया था। लालबहादुर शास्त्री, भूतपूर्व प्रधानमंत्री 111वीं जयंती चार काम जो उन्होंने गांधीवादी सिद्धांतों को मूर्त रूप देने के लिए किए महिलाओं की आत्मनिर्भरता ट्रांसपोर्टेशन में महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की शुरुआत शास्त्रीजी ने की। स्वतंत्रता के बाद वे उत्तर प्रदेश में गोविंद वल्लभ पंत के नेतृत्व वाली सरकार में ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर रहते उन्होंने यह फैसला लिया। अहिंसा का रास्ता उत्तर प्रदेश में पुलिस मंत्रालय के मुखिया रहते हुए भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पानी का इस्तेमाल शास्त्रीजी ने शुरू करवाया। इससे पहले तक विरोध प्रदर्शनों में पुलिस लाठी का उपयोग करती थी। भ्रष्टाचार विरोध, नैतिकता पर जोर केंद्रीय गृह मंत्री रहते हुए देश में पहली बार कमेटी ऑन प्रिवेंशन ऑफ करप्शन बनाने का फैसला लिया। 1956 में तमिलनाडु के अरियालूर में रेल दुर्घटना के बाद इस्तीफा दे दिया था। स्पष्ट लक्ष्य, सबकी समृद्धि शास्त्रीजी का स्पष्ट लक्ष्य था- सबकी समृद्धि। 1964 में प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले भाषण में उन्होंने यही कहा था- हमारा लक्ष्य बिलकुल स्पष्ट है: सबकी समृद्धि। लोकतांत्रिक समाजवादी राष्ट्र का विकास करना।

Report :- Desk
Posted Date :- 02/10/2015
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