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लंका नरेश रावण व महर्षि वशि‍ष्ठ कर चुके हैं तपस्या

Ajay Kumar

वैदिक काल में इष्टिकापुरी ही आधुनिक काल में इटावा नगरी है। अध्यात्म की अलौकिक और अद्वितीय मायानगरी के रूप में विख्यात रही है इष्टिकापुरी। देवों, ऋषियों-मुनियों को मनवांछित फल देने वाली यह पौरणित नगरी प्रकृति के लिये वरदायिनी रही है। इष्ट सिद्धि की कामना करने वाले तपस्वियों, ऋषियों-मुनियों को ही नहीं चक्रवर्ती सम्राटों को भी इष्टिकापुरी अपनी ओर आकर्षित करती रही है। यमुना के किनारे धूमनपुरा के समीप महबलशाली लंकानरेश रावण ने तपस्या की तो महर्षि वशिष्ठ ने यमुना के समीप जिस स्थान पर अकालके समय वर्षा की कामना के साथ तपस्या की, कालांतर में उस स्थान का नाम सुनवर्ष पड़ा वेद और उपनिषदों, ब्राहृमण एवं आरण्य कों कि इस भूमि में न जाने कितने पुण्य स्थल हैं जहां पर किसी ऋचा या मंत्र के सृष्टा ऋषियों ने तपस्या कर ज्ञान प्राप्त किया। यमुना के किनारे ऋषियों के तपस्‍थल और साधना के केन्द्र रहे हैं। महर्षि धौम्य के आश्रम में रह रहे आरूणी, उपमन्यु और वेद ने सारस्वत सांस्कृतिक, त्या‍ग, भूमि संरक्षण और पर्यावरण रक्षा का सांस्कृत यज्ञ प्रारम्भ किया था। इष्टवाह, इष्ट‍, आभीष्ट को वहन और पूर्ण करने वाली तपोस्थली है इष्टिकापुरी। चतुर्दिक वाहि‍नी यमुना के तट पर शैवतंत्र साधना एवं शक्ति साधन के पवित्र स्थल रहे है, जि‍नके कुछ अवशेष आज भी है। कालीवाहन, कालीवाड़ी, खटखटा बाबा की समाधि‍ स्थल, श्रीमहासरस्वती विद्यापीठ एवं इटावा के सभी घाट कि‍सी न कि‍सी साधना पद्धति‍ के सि‍द्ध स्थल रहे है। अश्वत्थामा को इष्टिकापुरी तथा यमुना-चम्बल के मध्य स्थित द्वैतवन से बहुत अनुराग रहा है। कश्मी‍र के शैव प्रत्यभि‍ज्ञा प्रदर्शन की तपोभूमि रही है।

Report :- Ajay Kumar
Posted Date :- 12-09-2012
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