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शासकीय उपेक्षा के चलते मिट रहा है कचौरा का प्राचीन इतिहास

Ashutosh Dubey

इटावा, 2 मार्च। प्राचीन काल में बहुमुखी प्रतिभा का धनी क्षेत्र कचौरा आज चकाचाौंध की होड़ में काफी पीछे छूट गया है। शासकीय उपेक्षा की भेंट चढ़ा यह क्षेत्र आज अपनी पहचान खोता जा रहा है। कभी अभाव एवं भौतिक विकास से दूर रहने के बाद भी इस क्षेत्र को महत्वपूर्ण स्थान मिला था, लेकिन आज यमुना नदी का पक्का पुल बन जाने और फर्राटा भरते वाहनों की रफ्तार ने यहां के स्थानीय व्यवसाय को खत्म कर दिया है और अब केवल नये भवनों की ऊंचाई भले बढ़ रही हो लेकिन प्राचीन धरोहर अपना अस्तित्व खोती नजर आ रही है। कचौरी देवी मंदिर सिद्धपीठ के नाम से स्थापित कचौरा ग्राम आज केवल यमुना नदी के मुहाने पर सडक़ के किनारे बसा गांव तक पहचान रख पा रहा है।

इतिहास के पन्नों में कैद कचौरा का इतिहास महत्वपूर्ण है यहां रह रहे बुजुर्ग श्यामबाबू बाजपेयी ने कुछ इस प्रकार बताया कहते हैं कि दक्ष प्रजापति के अपमान से मस्त मां सती के मृत शरीर को लेकर शिवजी लेकर निकले तो उनके कच (बाल) यहां गिरे थे जिससे यमुना के जंगल में यहां सिद्धपीठ बन गया। इस विषय में कहा जाता है कि कालान्तर में एक रात में यहां एक चतूबरे पर एक छोटी सी मठिया बन गई जिसमें छोटी सी देवी की प्रतिमा स्थापित थी, लेकिन मठिया में कलगी नहीं बनी शायद यह भोर होने के कारण नहीं बन सकी होगी। तभी से कचौरी देवी के नाम से इस गांव का कचौरा नाम पड़ा। 
धीरे-धीरे समय बदला और नदियों से व्यापार का समय आया। नावों द्वारा माल अनेक शहरों को लादकर यहां से जाने लगा। उस समय यह गांव व्यापार का बहुत बड़ा स्थान बन गया। यहां पर आसपास अपास की बड़ी पैदावार होती थी अत: कपास यहां से नावों द्वारा अनेक नगरों को भेजे जाने का क्रम चला, चूंकि ईख व मोटे अनाज की खेती भी बड़े पैमाने में इस क्षेत्र में होने से ईख पेरने के पत्थर के होल्हू आज भी खेतों में जगह-जगह पड़े हैं जो यहां ईख की पैदावार और गन्ना व्यवसाय का संकेत देते हैं। समय के बदलते परिदृश्य में यह गांव कांछनपुर पहलाने लगा जिसने बहुत बड़े बाजार का रूप ले लिया। कच्ची सडक़ें बन गयीं और यमुना नदी के किनारे हवेलियों ने स्थान ग्रहणकर लिया। इस गांव में कई बड़ी-बड़ी दूकानें भी स्थापित हुईं जिन्हें बाइस बसना के नाम से जाना जाने लगा जहां हुण्डी देखकर हुण्डीदाता को तत्काल रकम मुहैया कराने की व्यवस्था थी। आवागमन के बढ़ते रूख के चलते यहां बहुत बड़ी सराय बनायी गयी थी जहां आसपास के लोग घोड़ा, ऊंट, बैल आदि से आकर रूकते थे और आसपास के गांवों में अपना व्यापार करते थे। इस सराय में कई कुंए भी बने थे जो अब मिट्टी से पट चुके हैं। कांछनपुर अपना नाम बढ़ा चुका था इसी समय कि यक और किवदन्ति प्रचन में है जिसमें कहा गया कि जूनागढ़ से नर्सी मेहता ने एक व्यापारी को हुण्डासावलिया सेट के नाम की देकर यहां भेजा। वह व्यापारी यहां आकर दिनभर सांवलिया सेठ की तलाश करता रहा, थक हारकर वह एक कुंए की मुड़ेर पर आराम करने लगा तभी शाम के वक्त एक सेठ दिखाई दिया तो उसने उसका नाम पूछा जो सॉवलिया सेठ था जिसने हुण्डी ली और व्यापारी को रूपये दे दिए। सॉवलिया सेठ ने यह भी बताया कि हमारी दूकान नगर के बहुत भीतर है लेकिन मैं इसी वक्त प्रतिदिन आता हूं, इतना सुनकर व्यापरी जब नर्सी मेहता के पास पहुंचा और उसने अपना यह वृत्तान्त बताया तो नर्सी मेहता गदगद हो गए और कहा कि तू धन्य है तूने सावलिया के दर्शन कर लिये। यहां का वैभव बढ़ता गया और बीहड़ के कई स्थानों पर मंदिर बन गए। क्षेत्र में एक किला भी बना है जहां राजा भदावर अटेर से भागते समय कुछ दिन यहां रहे और बाद में नौगांव चले गए। इस सन्दर्भ में बुजुर्ग श्यामबाबू बाजपेयी ने बताया कि समय की रफ्तार अपने कदम बढ़ाती रही और धीरे-धीरे समय बदला, सडक़ें बनीं यहां घाट बनकर तैयार हुआ जिससे उतराई वसूली हुई और मण्डी बनी, लेकिन कचौरा का महत्व धीरे-धीरे कम हो गया। प्रदेश सरकार ने पक्का पुल यमुना नदी पर बनवा दिया जिससे आवागमन के साधन सुलभ हो गए। कचौरा में एक डिग्री कॉलेज इंजीनियरिंग कॉलेज तथा एक सुन्दर ढाबा बन जाने से क्षेत्र में रौनक बढ़ी। उन्होंने यह भी बताया कि इसी दौर में कचौरा देवी के मंदिर का जीर्णोद्धार क्षेत्रीय बसंत लाल भारद्वाज के पुत्र संदीप ने उसे आकर्षक बना दिया, लेकिन प्रचीनकिला व सरायएवं अन्य प्राचीन इमारतें अपना अस्तित्व खो रही हैं जो इतिहास के पन्नों में कैद हैं। यदि समय रहते ध्यान न दिया गया तो आने वाली पीढ़ी अपने इतिहास से अनभिज्ञ हो जाएगी। 
 

Report :- Ashutosh Dubey
Posted Date :- 02-03-2017
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