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Tag: इतिहास

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अर्जुन सिंह भदौरि‍या ने कि‍या ‘लाल सेना’ का गठन

जि‍ले में अर्जुन सि‍हं भदौरि‍या ने गांवों के लोगों  को संगठि‍त कर सशस्‍त्र लाल सेना बनाकर क्रान्‍ि‍त के लि‍ये  पूर्ण  तैयारी कर ली थी। इन आन्‍दोलन को देखकर  लोगों  को

झण्डा लगाने की कोशि‍श में पुलि‍सि‍या गोली के शि‍कार बने छह लोग

भर्थना के वि‍द्यार्थियों ने जुलूस नि‍काला। मवेशीखाने के मवेशियों  को मुक्‍त्‍ा कर दि‍या और  तहसील पर राष्‍ट्रीय झण्‍डा लगा दि‍या तथा रेल के तार काट दि‍ये गये। उसी तारीख को

करूणाजनक घटना रही ‘नगला ढकाऊ’ का गोली कांड

इस आन्‍दोलन की चि‍र स्‍मरणीय, कि‍न्‍तु करूणाजनक घटना थी ‘नगला ढकाऊ’ का गोलीकांड। जि‍समें तीन व्‍यक्‍ि‍त पुलि‍स को गोली के शि‍कार हुए।यह गोलीकांड 10 मार्च 1931 को हुआ, जि‍समें   बलवंत

जब नेहरू और गांधी आंदोलन को गति‍ देने इटावा आये

इटावा  और  मुख्‍य कस्‍वों  मे पूरी हड़ताल  रही।  पुलि‍स  ने  जुलूसों  पर डण्‍डे  बरसाये। इसी समय पं0 जवाहर लाल नेहरू  ने इटावा  आकर  आन्‍दोलन को गति‍ दी।  नवम्‍बर सन् 1928 

काकोरी कांड में गि‍रफतार हुये ज्योति‍ शंकर दीक्षि‍त और मुकुन्दी लाल

क्रान्‍ि‍तकारि‍यों  ने अपना कार्यक्रम शुरू कर दि‍या और  राजनैति‍क डकैति‍यों  का सि‍लसि‍ला जारी हुआ । 9 अगस्‍त सन्  1925  को काकोरी  कांड के रूप में एक डकैती  हुई,  जि‍समें इटावा 

जब अंग्रेजों ने इटावा छोड़ने का फरमान दि‍या

इस बीच ह्यूम  ने एक और दूरदर्शी कार्य कि‍या था। उन्‍होंने  इटावा में  स्‍ि‍थत खजाने का एक बड़ा भाग आगरा भेज दि‍या था तथा शेष  भाग इटावा  के ही अंग्रेजों

बलैया मंदि‍र के नि‍कट हुई वि‍द्रोहि‍यो व पुलि‍स के मध्य मुठभेड़

19 मई 1857 ई0 को इटावा, आगरा रोड पर जसवन्‍तनगर  के बलैया मंदि‍र पर नि‍कट बाहर से आ रहे कुछ सशस्‍त्र वि‍द्रोहि‍यों और गश्‍ती  पुलि‍स के मध्‍य मुठभेड़ हुई। वि‍द्रोहि‍यों

1857 के मेरठ वि‍द्रोह की आग दो दि‍न बाद इटावा पहुंची

10मई 1857 ई0 को मेरठ छावनी  मे फूटी  वि‍द्रोह  की आग दो दि‍न बाद ही यानी 12 मई को इटावा तक आ पहुंची। उस समय जि‍ले में 9 नम्‍बर देशी

जब क्रांतिकरि‍यों का दमन करने की जि‍म्मेदारी मि‍ली कलेक्टर हयूम को

दरअसल भौगोलि‍क दृष्‍टि‍ ये यह जि‍ला क्रांति‍कारि‍यों के लि‍ये बड़ा ही  उपयुक्‍त साबि‍त हुआ था। क्‍योंकि‍ यहां यमुना – चंवल के घने  बीहड़ों  में शरण लेकर अंग्रेजों  के वि‍रूद्ध युद्ध

स्वाधीनता संग्राम में इटावा का योगदान

सन् 1857ई0 में वि‍द्रोह की ज्‍वाला बनकर फूट पड़े प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम के दौरान इटावा जि‍ला क्रान्‍ति‍कारि‍यों का प्रमुख रणक्षेत्र रहा। यहां लगभग डेढ़ वर्ष तक अंग्रेजी फौजी और क्रांन्‍ि‍तकारि‍यों 

इटावा पर हुआ लड़ाकू जाति‍ का अधि‍कार

1761 ई0 में पानीपत के युद्ध में मराठे  अहमदशाह अब्‍दाली से हार गये । अब्‍दाली  ने भारत से जाते समय अपने बहुत  से प्रदेश रूहेलों  में दे दि‍ये। इटावा को 

जयपुर के राजा जयसि‍ह के अधि‍कार में भी रहा इटावा

दि‍ल्‍ली में मुगल साम्राज्‍य के पतनोन्‍मुखी काल में इटावा फर्रूखाबाद  के नबाव के अधि‍कार में आ गया। कुछ समय के लि‍ये  इटावा  जयपुर के राजा जयसि‍हं के अधि‍कार  में भी

आगरा सूबे में चला गया इटावा का कुछ भाग

शेरशाह तथा सूर शासन के पश्‍चात 1556 ई0 से अकबर का राज्‍य स्‍थापि‍त हो गया। अकबर के काल में इटावा का कुछ भाग आगरा सूबे में चला गया। यहां पर

बाबर ने इटावा पर भी कि‍या था अधि‍कार

1528 ई0 में कालपी-कन्‍नौज के साथ ही बाबर ने इटावा पर भी अधि‍कार  कर लि‍या। इटावा की जागीर हुमायूं ने  उजबेग सुल्‍तान हुसैन को दे दी । बाबर की मृत्‍यु

इटावा कि‍ले पर हुआ लोदि‍या का अधि‍कार, इब्राहि‍म लोहानी बने गवर्नर

1487 ई0 में जौनपुर तथा दि‍ल्‍ली  के लोदी वंश के बीच पुन:संधि‍  टूट गई। इटावा में बहलोल लोदी  तथा जौनपुर की  ओर से हुसैन शाह के भाई  इब्राहीम खां तथा 

जौनपुर राज्य के अधीन रहा इटावा

इस अवसर पर इटावा  के राजपूतों को वश में करने के लि‍ये आक्रमण कि‍या गया। आगे चलकर दि‍ल्‍ली के सुल्‍तानों  की शक्‍ि‍त लगातार क्षीण होती चली गयी और जौनपुर एक

अंग्रेजी शासन में वर्ष 1801 में शामि‍ल कि‍या गया था इटावा

प्रचलि‍त मान्‍यताओं के अनुसार इसी वंश के चन्‍द्रभान ने प्रतापनेर का नगला अर्थात चन्‍दरपुरा बसाया। वि‍क्रम सि‍हं ने  वि‍क्रमपुर बसाया। उन्‍ाके पुत्र प्रतापसि‍हं  ने प्रतापनेर बसाया और वहीं जाकर रहने

जयचन्द्र और मुहम्म द गौरी का इकदि‍ल में हुआ था युद्ध

पृथ्‍वीराज चौहान को 1192 ई0 में तराईन के द्वि‍तीय युद्ध में मुहम्‍मद गौरी  ने पराजि‍त  कर 1193ई0 में कन्‍नौज्‍ा पर आक्रमण  कर आसई में पूरा  खजाना लूट लि‍या  था। यह

आसई में महावीर स्वामी ने चातुर्मास कि‍या था व्यतीत

छठी शाताब्‍दी ईसा पूर्वा में जब बैदि‍क धर्म  के वि‍रूद्ध धार्मिक क्रांति‍  हुई और महात्‍मा बुद्ध तथा महावीर स्‍वामी ने इसका नेतृत्‍व कि‍या तो इटावा भी इसमें शामि‍ल था। इटावा 

इष्टिु‍कापुरी का बदला हुआ नाम है इटावा

कति‍पय वि‍द्वानों  के मतानुसार आगरा जि‍ला के बटेश्‍वर  से लेकर  भरेह तक के मार्ग को इष्‍टपथ  के नाम से जाना जाता है। इष्‍टि‍कापुरी के नामकरण के पीछे इस सम्‍पूर्ण मार्ग